LAW'S VERDICT

22 साल तक लड़ा बेटा, दिवंगत पिता को दिलाया इन्साफ

मप्र हाईकोर्ट ने पलटा ट्रिब्यूनल का फैसला, सेवा लाभों पर फिर से विचार करने के आदेश 

जबलपुर। पिता के सम्मान और हक की लड़ाई को बेटे ने दो दशक तक जिंदा रखा और आखिरकार न्याय मिल ही गया। न्यू कटनी जंक्शन में फिट्टर पद पर कार्यरत रहे स्वर्गीय राम मणि के सेवा लाभों के मामले में हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीज़न बेंच ने बड़ा फैसला सुनाते हुए पुराने आदेशों को रद्द कर दिया और विभाग को दोबारा नियमों के तहत निर्णय लेने के निर्देश दिए। मप्र उच्च न्यायालय का यह फैसला केवल आर्थिक लाभ का नहीं, बल्कि दिवंगत कर्मचारी की प्रतिष्ठा बहाल करने बेटे द्वारा लड़ी गई लम्बी कानूनी लड़ाई का भी प्रतीक है। यह मामला उन परिवारों के लिए मिसाल है, जो वर्षों तक न्याय की उम्मीद में संघर्ष करते हैं—और अंततः सच की जीत होती है।

1986 से शुरू हुआ संघर्ष

स्व. राम मणि को वर्ष 1986 में सेवा से हटा दिया गया था। बाद में ट्रिब्यूनल ने हटाने के आदेश को बदलते हुए उन्हें निलंबित माना। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आपराधिक मामले में 22 अगस्त 2001 को विशेष रेलवे मजिस्ट्रेट ने साक्ष्यों के अभाव में उन्हें बरी कर दिया। इसके बाद वे पुनः सेवा में बहाल हुए, लेकिन उन्हें पूर्ण वेतन, इंक्रीमेंट, भत्ते और पेंशन लाभ नहीं दिए गए।

‘डाउट का लाभ’ कहकर रोके गए हक

रेलवे ने यह कहते हुए स्व. राम मणि को सेवा लाभ देने से इनकार किया कि कर्मचारी को “benefit of doubt” पर बरी किया गया था। इसी आधार पर निलंबन अवधि को “नॉन-ड्यूटी” मान लिया गया और वेतन-भत्ते रोके गए। सेवा लाभों से वंचित रहने के दौरान ही 09 नवंबर 2004 को राम मणि का निधन हो गया। इसके बाद उनके बेटे बसंत लाल विश्वकर्मा ने पिता की लड़ाई अपने कंधों पर उठा ली।

बेटे ने नहीं छोड़ी उम्मीद, जारी रखी लड़ाई 

ट्रिब्यूनल से राहत न मिलने पर बेटे बसंत लाल विश्वकर्मा ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने पाया कि मजिस्ट्रेट के निर्णय में स्पष्ट था कि अभियोजन के पास पर्याप्त साक्ष्य नहीं थे। यह मात्र संदेह का लाभ नहीं, बल्कि साक्ष्य के अभाव में बरी होना था। जस्टिस रूसिया की अध्यक्षता वाली डिवीज़न बेंच ने अपने फैसले में कहा कि बिना विभागीय जांच लंबित रहे और बिना दंड के, निलंबन अवधि को स्वतः “नॉन-ड्यूटी” नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने Union of India v. K.V. Jankiraman के सिद्धांतों का हवाला देते हुए सेवा लाभों पर पुनर्विचार के निर्देश दिए। याचिकार्ता बसंत लाल विश्वकर्मा की ओर से अधिवक्ता प्रागल्भ लता श्रीवास्तव ने पैरवी की।

हाईकोर्ट का आदेश

  • ट्रिब्यूनल का 05.12.2006 का आदेश निरस्त

  • सक्षम प्राधिकारी का 16.02.2005 का आदेश रद्द

  • प्रकरण 60 दिनों में नियमों के तहत पुनर्विचार का निर्देश

हाईकोर्ट का आदेश देखें  WP-6204-2008

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